एक बार माता पार्वती ने भगवन शिव से पुछा, स्वामी मेरे मन में कुछ प्रश्न चल रहा। बिना आपके सहभागिता के इस प्रश्न का निवारण पाना लगभग मेरे लिए असंभव प्रतीत हो रहा है। भगवन शिव ने कहा कहो पार्वती क्या प्रश्न है. ...........
माता पार्वती ने कहा हे प्रभु ये बतलाइये उसका ही आप क्यूँ अनहित करते है जो पहले से ही कष्ट में होता है अर्थात बिगड़े हुए को ही दुनिया क्यों बिगड़ती है। .... इस प्रश्न ने मेरे मन को अंत्यंत विचलित कर रखा है।
तब भगवन शिव ने कहा हे देवी इस प्रश्न के निवारण के लिए आपको हमारे साथ पृथ्वी लोक पर चलना पड़ेगा क्या आप तैयार है। ..........?
तब शिव एवं पारवती साधु और साध्वी का भेष धारण कर के धरती पर पहुंचे। पृथ्वी पर पहुँचते ही भगवन शिव ने माता पारवती से कहा हे देवी आप चूल्हे एवं लकड़ी का इंतजाम कीजिये तब तक हम पास का गांव से भिक्षा मांग कर आते है। ..... पारवती जी बड़ी ही चिंता में पड़ गईं लकड़ी का जुगाड़ तो आसानी से हो जायेगा परन्तु चूल्हे के निर्माण के लिए ईट कहाँ से ले जाये। जैसे तैसे उन्होंने ईट का प्रबन्द कर के चूल्हे का निर्माण कर डाला. अब वो भगवान शिव की प्रतीक्षा कर रही थी, शिव के आते ही भोजन पका और माता पार्वती ने दो थाली में भोजन परोसा। .... भोजन ग्रहण करने से पूर्व शिव ने पार्वती से पूछा ये बताइये अपने लकड़ी का इंतजाम कहा से किया तो उन्होंने बड़ी सरलता से जवाब दिया प्रभु यहाँ तो दूर तक जंगल ही जंगल है इसलिए लकड़ियाँ आसानी से प्राप्त हो गई ,फिर उन्होंने पूछा ईट का प्रबंध कहा से किया तो पार्वती जी ने कहा पास के गावं से शिव जी ने कहा उस गावं में तो सभी घर पक्के और अच्छे बने है फिर , अब पार्वती जी सोच में पद गई। .... उन्होंने बताया गावं के बाहर एक बुढ़िया की झोपड़ी थी जिसकी दिवार टूटी फूटी थी बस उसी से ईंटे निकली थी अब इस से पहले के शिव जी कुछ कहते पार्वती जी को उनके सवाल का जवाब मिल चूका था।

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