मौत ज़िन्दगी से कितनी बेहतर है
ज़िंदा थे तो किसी ने पास बिठाया नहीं ,अब खुद मेरे चारों ओर बैठे जा रहे हैं।
पहले कभी किसी ने मेरा हाल न पुछा ,
अब सभी आंसू बहाए जा रहे हैं।
एक रुमाल भी भेंट नहीं किया जब हम ज़िंदा थे ,
अब शॉलें और कपड़े ओढ़ाए जा रहे हैं।
सबको पता है शॉलें और कपड़े इसके काम के नहीं हैं ,
मगर फिर भी बेचारे दुनियदारी निभाए जा रहे हैं।
कभी किसी ने एक वक्त का खाना तक नहीं खिलाया ,
अब देशी घी मेरे मुँह में डाले जा रहे हैं।
ज़िन्दगी में एक कदम भी साथ न चल सका कोई ,
अब फूलों से सजा कर कंधे पर उठाये जा रहे हैं।
आज पता चला कि ,
मौत ज़िन्दगी से कितनी बेहतर है।
